मन ही मनमे आज भी लड्डू फुट पड़ते हैं जब बलरामपुर की भाभी अर्पिता याद आती हैं. एक सरकारी योजना के प्रबंधन के लिए मुझे कुछ डेढ़ महिना इस गाँव में रुकना हुआ था. और जिस घर में रुके थे वो अर्पिता भाभी का था. पंचायत में जॉब करता था उसका पति और उसने ही हमें घर दिया था.शरू के दिनों से ही अर्पिता भाभी मेरे मन में बसी थी. कुछ हफ्ता भर लगा होगा उसे सेट करने में. पंचायत के अंदर एक दो मीटिंग में मेरी जरूरत नहीं थी तो मैं पेपरवर्क के बहाने पीछे रुक के भाभी को चोद लेता था.
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